आज कुछ लोग तर्क देते है कि- दुनिया को बदलने और शांति कायम करने के लिए जरूरी है हमारे कथित दुश्मनों के खिलाफ जोरदार लड़ाई की...."शांति के लिए लड़ना सन्नाटे के लिए चिल्लाने के समान है" इससे वही ज्यादा होता है जो आप नहीं चाहते !
आजकल हर चीज के विरुद्ध एक युद्ध छिड़ा हुआ है "आतंक के खिलाफ युद्ध", "बीमारी के खिलाफ युद्ध", "भूख के खिलाफ युद्ध" यह लड़ाई एक सामूहिक भ्रम का हिस्सा है; हम कहते हैं कि हम शांति चाहते हैं..... लेकिन हम युद्ध करवाने वाले नेताओं को ही चुनते रहते हैं !
हम खुद से ही झूठ बोलते हैं यह कहकर कि- हम मानव अधिकारों के पक्षधर हैं; लेकिन कारखानों में बनी हुई चीजों को खरीदते रहते हैं, हम कहते हैं कि हमें स्वस्थ हवा चाहिए लेकिन खुद प्रदूषण भी करते रहते हैं, हम चाहते हैं कि विज्ञान कैंसर से हमारा इलाज करें लेकिन खुद को बीमार करने वाली उन आदतों को नहीं बदलते जिनसे हम बीमार पड़ सकते हैं...
हम खुद को धोखा देते हैं कि हम एक बेहतरीन जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं हम अपने उन छिपे हुए हिस्सों को नहीं देखना चाहते जो पीड़ा और मृत्यु की अनदेखी कर रहे हैं !
यह विश्वास जो हमारी सोच और विचार से आया है कि हम कैंसर भूख और आतंक या किसी भी दुश्मन के खिलाफ युद्ध जीत सकते हैं दरअसल हमें इस धोखे में रखता है कि हमें इस ग्रह पर जीवन जीने के तरीके को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं...
आंतरिक दुनिया वह जगह है जहां क्रांति सबसे पहले होनी चाहिए जब हम अपने अंदर जीवन के हर पल चलने वाले सर्पिल चक्र को महसूस कर सकेंगे तभी बाहरी दुनिया शांति के अनुसार बदल सकेगी क्योंकि खुद के बदलाव से ही हर चीज का बदलाव संभव है खुद के ना बदलने पर बदलने वाला कुछ भी नहीं....
बाह्य संसार हमारी ही वास्तविक प्रतिकृति है हम परछाई को बदलकर खुद में परिवर्तन लाने की निरर्थक चेष्टाएँ करते रहते हैं जो कि हजारों वर्षों में आज तक कभी सफल नहीं हो पाई और भविष्य में कभी भी हो नही सकती.... क्योंकि प्रतिकृति किसी भी व्यक्ति या वस्तु की उपस्थिति एवं स्थिति की प्रमाण मात्र है जो कर्ता और कृतित्व से सर्वथा विपरीत है !
।। जय श्री कृष्ण ।।
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